तकरीबन हर क्षेत्र के एक्सपोर्ट में गिरावट
जीटीआरआई की रिपोर्ट में कहा गया है, 'चूंकि सभी ग्लोबल सप्लायर्स को समान टैरिफ का सामना करना पड़ा, इसलिए यह गिरावट भारतीय प्रतिस्पर्धात्मकता के किसी भी नुकसान की तुलना में अमेरिकी औद्योगिक गतिविधि में मंदी से ज्यादा जुड़ी हुई लगती है।'कपड़ा, रत्न और आभूषण, रसायन, कृषि-खाद्य पदार्थ और मशीनरी जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र में 33% की गिरावट दर्ज की गई। ये मिलकर अमेरिका को भारत के निर्यात का लगभग 60% हिस्सा बनाते हैं। मई में यह 4.8 अरब डॉलर था, जो सितंबर में घटकर 3.2 अरब डॉलर रह गया।
रत्न और आभूषण निर्यात में 59.5% की भारी गिरावट आई। यह 50.02 करोड़ डॉलर से घटकर 20.28 करोड़ डॉलर रह गया। इससे सूरत और मुंबई जैसे मैन्युफैक्चिंरग केंद्रों को बड़ा झटका लगा है। रिपोर्ट के अनुसार, थाईलैंड और वियतनाम ने भारत के खोए हुए अमेरिकी ऑर्डर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हासिल कर लिया है।
सौर पैनलों का निर्यात 60.8% तक गिर गया। कभी भारत के रिन्यूएबल एनर्जी एक्सपोर्ट का यह बढ़ता हुआ हिस्सा था। यह 20.26 करोड़ डॉलर से घटकर 7.94 करोड़ डॉलर रह गया। जीटीआरआई ने इसका कारण प्रतिस्पर्धात्मकता का भारी नुकसान बताया। कारण है कि चीन को इसी तरह के उत्पादों पर केवल 30% टैरिफ और वियतनाम को 20% टैरिफ का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रसायन, समुद्री और समुद्री भोजन, कपड़ा और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात में भी बड़ी गिरावट देखी गई।
वियतनाम, चीन, मैक्सिको के हाथों बाजार खोने का डर
निर्यातकों ने अब इस संकट से निपटने के लिए तत्काल नीतिगत समर्थन की मांग की है। जीटीआरआई ने कहा, 'प्राथमिकता उपायों में वित्तपोषण लागत को कम करने के लिए ब्याज समकरण सहायता बढ़ाना, तरलता दबाव को कम करने के लिए तेजी से ड्यूटी छूट देना और एमएसएमई निर्यातकों के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइनें शामिल हैं।'बिना तत्काल हस्तक्षेप के भारत वियतनाम, मैक्सिको और चीन जैसे देशों से बाजार हिस्सेदारी खोने का जोखिम उठा रहा है। यहां तक कि उन क्षेत्रों में भी जहां उसका पारंपरिक रूप से दबदबा था।
जीटीआरआई ने निष्कर्ष निकाला, 'नवीनतम आंकड़े एक बात स्पष्ट करते हैं। टैरिफ ने न केवल भारत के व्यापार मार्जिन को निचोड़ा है, बल्कि प्रमुख निर्यात उद्योगों में संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर किया है।'

